मंगलवार, 2 दिसंबर, 2008

इस बार नहीं -

इस बार जब वह छोटी सी बच्ची
मेरे पास अपनी खरोंच लेकर आएगी
मैं उसे फू-फू करके नहीं बहलाऊंगा
पनपने दूंगा उसकी टीस को
इस बार नहीं

इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखूंगा
नहीं गाऊंगा गीत पीड़ा भुला देने वाले
दर्द को रिसने दूंगा
उतरने दूंगा गहरे
इस बार नहीं

इस बार मैं ना मरहम लगाऊंगा
ना ही उठाऊंगा रुई के फाहे
और ना ही कहूंगा कि तुम आंखे बंद करलो,
गर्दन उधर कर लो मैं दवा लगाता हूं
देखने दूंगा सबको
हम सबको
खुले नंगे घाव
इस बार नहीं

इस बार जब उलझनें देखूंगा,
छटपटाहट देखूंगा
नहीं दौड़ूंगा उलझी डोर लपेटने
उलझने दूंगा जब तक उलझ सके
इस बार नहीं

इस बार कर्म का हवाला दे कर नहीं उठाऊंगा औज़ार
नहीं करूंगा फिर से एक नई शुरुआत
नहीं बनूंगा मिसाल एक कर्मयोगी की
नहीं आने दूंगा ज़िंदगी को आसानी से पटरी पर
उतरने दूंगा उसे कीचड़ में, टेढ़े-मेढ़े रास्तों पे
नहीं सूखने दूंगा दीवारों पर लगा खून
हल्का नहीं पड़ने दूंगा उसका रंग
इस बार नहीं बनने दूंगा उसे इतना लाचार
की पान की पीक और खून का फ़र्क ही ख़त्म हो जाए
इस बार नहीं

इस बार घावों को देखना है
गौर से
थोड़ा लंबे वक्त तक
कुछ फ़ैसले
और उसके बाद हौसले
कहीं तो शुरुआत करनी ही होगी
इस बार यही तय किया है

-
प्रसून जोशी

शनिवार, 11 अक्‍तूबर, 2008

मेरी बेटी

जहाँ चलती मेरी गुड़िया रानी
बजते घुंघुरू पाँव में
आ लाली मेरी बाँहों में ।

हर पल तुमको खुश रखू
हर खुशिया पहनाऊ
जो तू मांगे हीरे मोती
अगर मिले तो लाऊ

लाली मेरी खुशिया बिखराए
आजा धूप से छाह में
आ लाली मेरी बांहों में

हर खुशिया उपहार मिले तुझे
बस जा मेरी आशाओं में
आ लाली मेरी बाहों में

लोग कहेगे अपने मुह से
मेरा सपना सच्चा है
रोशन होगा नाम हमारा
लोग कहे मेरा बच्चा है

जहाँ चलती मेरी गुड़िया रानी
बजते घुंघुरू पाँव में
आ लाली मेरी बाँहों में

शुक्रवार, 10 अक्‍तूबर, 2008

सजा


पूछ लो खुदा से आपके लिए ही दुआ मांगी ,
पूछ लो हवा से आपके लिए ही फिजा मांगी ।
आपने की जितनी भी गलतिया ,
हमने दुआ में अपने लिए उतनी ही सजा मांगी ।

तेरी जुदाई


खुदा किसी को किसी पे फ़िदा ना करे ,
करे तो क़यामत तक जुदा ना करे ,
यह माना की कोई मरता नही जुदाई में ,
लेकिन जी भी तो नही पता तन्हाई में ...

बुधवार, 1 अक्‍तूबर, 2008

वो कहते है


वो कहते है मजबूर है हम ,
ना चाहते हुए भी तुमसे दूर है हम ,
चुरा ली उन्होंने धड़कने भी हमारी ,
फिर भी कहते है बेकसूर है हम !
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कुछ रिश्ते अनजाने में हो जाते है ,
पहले दिल, फिर ज़िन्दगी से जुड़ जाते है ,
कहते है उस दौर को दोस्ती ,
जिस में दिल से दिल ना जाने कब जुड़ जाते है !

गुरुवार, 25 सितंबर, 2008

दुआ

चाहत में किसी का इम्तिहान ना लेना ...

जो निभा ही ना सको वो वादा ना देना ...

जिसे आपके बिन जीने की आदत ही ना हो ...

उसे कभी अकेले जीने की दुआ ना देना ।

हर पल , हर दम

साज़ के साथ आवाज

समुंदर का साथ साहिल ,

फूल के साथ खुशबू

जिस्म के साथ रूह

खुशी के साथ गम

और आप के साथ हम , हर पल हर दम

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कसूर उनका है न मेरा ,
हम दोनों ही रस्मे निभाते रहे ।
वो दोस्ती का एहसास जताते रहे ।
हम मोहब्बत को दिल में छुपाते रहे .