शनिवार, १८ अगस्त २००७

दो बदन

हमने देखा उन्‍हें
दिन में और रात में
मास्जिदों के मिनारों ने देखा उन्‍हें
मन्दिरों के किवाड़ों ने देखा उन्‍हें
मयकदे की दरारों ने देखा उन्‍हें

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