पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी
आंखों कों अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते
शनिवार, १८ अगस्त २००७
महक
तकिये पे तेरे सर का वो बाल है पड़ा
है चादर में तेरे जिस्म की वो सौंधी सी खुशबु
हाथों में महकता है तेरे चहरे का एहसास
माथे पे तेरे होठों की मोहर लगी है
तू इतनी करीब है की तुझे देखूं तो कैसे
थोड़ी सी अलग हो तो तेरे चहरे को देखूं
है चादर में तेरे जिस्म की वो सौंधी सी खुशबु
हाथों में महकता है तेरे चहरे का एहसास
माथे पे तेरे होठों की मोहर लगी है
तू इतनी करीब है की तुझे देखूं तो कैसे
थोड़ी सी अलग हो तो तेरे चहरे को देखूं
दो बदन
हमने देखा उन्हें
दिन में और रात में
मास्जिदों के मिनारों ने देखा उन्हें
मन्दिरों के किवाड़ों ने देखा उन्हें
मयकदे की दरारों ने देखा उन्हें
दिन में और रात में
मास्जिदों के मिनारों ने देखा उन्हें
मन्दिरों के किवाड़ों ने देखा उन्हें
मयकदे की दरारों ने देखा उन्हें
खाक हो जायेंगे हम तुम को खबर होने तक !
मत पूछ के क्या हाल है, मेरा तेरे पीछे ,
तू देख के क्या रंग , तेरा मेरे आगे !
------------------------------------
अब ख़ुशी है ना कोई गम रुलाने वाला ,
हम ने अपना लिया हर रंग जमाने वाला !
तू देख के क्या रंग , तेरा मेरे आगे !
------------------------------------
अब ख़ुशी है ना कोई गम रुलाने वाला ,
हम ने अपना लिया हर रंग जमाने वाला !
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
